आरक्षण से बदले समीकरण, भाजपा की गुटबाजी बन सकती है गले की फांस।

रिपोर्ट नरेंद्र सैनी पांवटा साहिब।
पांवटा साहिब नगर परिषद का इस बार का चुनाव पूरी तरह हाई-वोल्टेज सियासी मुकाबले में बदलता नजर आ रहा है। महिला वर्ग के लिए अध्यक्ष पद आरक्षित होते ही राजनीतिक दलों की रणनीति पलट गई है और अब हर चाल बेहद सोच-समझकर चली जा रही है।
जहां कांग्रेस इस मौके को सुनहरे अवसर के रूप में देख रही है, वहीं भाजपा के अंदर की गुटबाजी उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनती नजर आ रही है। नगर परिषद के कई वार्ड ऐसे बताए जा रहे हैं जहां भाजपा से एक नहीं, बल्कि 3-4 दावेदार मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे हालात में वोटों का बिखराव भाजपा को भारी पड़ सकता है।
इसी बीच कांग्रेस पार्टी के पूर्व पार्षद रविंद्र और डॉ. नागीया इस बार गेम चेंजर की भूमिका में नजर आ सकते हैं। दोनों नेताओं की जमीनी पकड़ और स्थानीय स्तर पर प्रभाव को देखते हुए पार्टी को उनसे खास उम्मीदें हैं।
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने का सीधा असर स्थानीय चुनावों पर भी दिख सकता है। पार्टी हर हाल में पांवटा नगर परिषद पर कब्जा जमाने की रणनीति बना रही है और मजबूत महिला चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में है।
दूसरी ओर, भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा संगठन को एकजुट रखने की है। अगर पार्टी ने सही समय पर सही चेहरा नहीं चुना, तो अंदरूनी खींचतान पूरी बाजी पलट सकती है। राजनीतिक गलियारों में पूर्व पार्षद निर्मल कौर का नाम तेजी से उभर रहा है, जिन्हें एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा एकजुट होकर मुकाबला करती है या गुटबाजी के चलते कांग्रेस को सीधी राह मिल जाती है। पांवटा का यह चुनाव सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि सियासी रणनीति और संगठन की असली परीक्षा बन चुका है।
